पटना यूनिवर्सिटी में इस बार दाखिले से ज़्यादा चर्चा खाली सीटों की हो रही है। जी हां, विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित दीवारों के भीतर कुल 952 पीजी सीटें अब भी बिना छात्र के तन्हा पड़ी हैं, जैसे किसी क्लासिकल प्रेम कहानी में नायिका इंतजार में बैठी हो और नायक का कोई अता-पता न हो।
जब देश भर के विश्वविद्यालय सीटों की कमी और एडमिशन की मारामारी से जूझ रहे हैं, तब पटना यूनिवर्सिटी ने सोचा – “चलो, हम बाकी सबसे अलग चलते हैं। हम सीटें खाली छोड़ देंगे, ताकि छात्र सोचें कि यहां दाखिला लेना हमारी महानता को समझने जैसा है।”
लेकिन सवाल उठता है कि इतनी सीटें आखिर खाली क्यों हैं? जवाब सीधा है— प्रशासनिक चूक, सुस्त रफ्तार, और अद्भुत “मौन नीति”। पहले दौर की एडमिशन प्रक्रिया में छात्रों को सीटें तो दी गईं, लेकिन जब तक छात्र समझ पाते, सीटें चली गईं या फिर सूचनाएं उन तक पहुंची ही नहीं। जो पहुंचे, उन्हें “अभी सिस्टम डाउन है” सुनने को मिला। और जब सिस्टम अप हुआ, तो लिस्ट डाउन हो गई।
अब यूनिवर्सिटी कह रही है कि “भईया अब तो कैजुअल वैकेंसी निकाले हैं, जो बचा है वही खा लो, नहीं तो अगली बार देख लेना।” छात्र अब सोच में हैं कि यह दाखिले का सिस्टम है या सरकारी टेंडर का कोई ड्रामा?
विश्वविद्यालय की ओर से यह भी कहा गया है कि कैजुअल वैकेंसी के ज़रिए मेरिट के आधार पर छात्रों को बुलाया जाएगा। अब यह मेरिट कैसे तय होगी—ईश्वर ही मालिक! जिन छात्रों ने पहले अप्लाई किया था, वो भी दुविधा में हैं कि फिर से फॉर्म भरें या सीधे यूनिवर्सिटी जाकर खाली कुर्सियों के पास मोमबत्ती जलाएं।
कुल मिलाकर पटना यूनिवर्सिटी की यह पीजी प्रवेश गाथा एक ऐसे व्यंग्य की तरह बन गई है, जो गंभीरता के लिबास में छुपी हुई हास्य फिल्म हो। और छात्र… वो अब एडमिशन कम, प्रशासनिक कौशल का लाइव रियलिटी शो ज़्यादा देख रहे हैं।