भारत से विदेशों में पढ़ाई के लिए जाने वाले छात्रों की संख्या लगातार बढ़ती रही है, लेकिन 2024 में इसमें थोड़ी कमी देखने को मिली। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में 2.6 लाख छात्र विदेशों में पढ़ाई के लिए गए थे। इसके बाद यह संख्या तेजी से बढ़ी और 2021 में 4.45 लाख, 2022 में 7.52 लाख, तथा 2023 में लगभग 8.95 लाख तक पहुंच गई। यह आंकड़ा अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड माना गया। हालांकि, 2024 में यह संख्या घटकर 7.6 लाख पर आ गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में स्पष्ट गिरावट है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों का यह रुझान कई कारणों से जुड़ा है। महामारी के बाद की वैश्विक परिस्थितियों, विदेशी विश्वविद्यालयों की नीतियों, वीज़ा नियमों में बदलाव और डॉलर-रुपया विनिमय दर जैसे आर्थिक कारकों का इस पर सीधा असर पड़ा है। 2020 में कोरोना महामारी के कारण जब अंतरराष्ट्रीय आवाजाही पर पाबंदियाँ थीं, तब विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही। लेकिन जैसे ही पाबंदियाँ हटीं और विश्वविद्यालयों ने अपने दरवाज़े खोले, छात्रों का विदेश जाने का सिलसिला तेजी से बढ़ गया।
2023 में जिस तरह से लगभग नौ लाख भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ाई के लिए गए, वह भारतीय शिक्षा और वैश्विक स्तर पर भारतीय युवाओं की महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक माना गया। वहीं 2024 में आई गिरावट को विशेषज्ञ स्थायी प्रवृत्ति नहीं मानते, बल्कि इसे अस्थायी उतार-चढ़ाव की तरह देख रहे हैं। उनका कहना है कि आने वाले वर्षों में यह संख्या फिर से बढ़ सकती है, क्योंकि विदेशी शिक्षा और वैश्विक अनुभव हासिल करने की चाह भारतीय छात्रों के बीच लगातार बनी हुई है।
विदेशों में उच्च शिक्षा पाने वाले छात्रों का यह बढ़ता रुझान भारत के लिए भी एक चुनौती और अवसर दोनों है। चुनौती इसलिए कि मेधावी छात्र देश से बाहर जा रहे हैं, और अवसर इसलिए कि वे वैश्विक अनुभव के साथ वापस आकर भारत की प्रगति में योगदान कर सकते हैं।