2 मई के उस आदेश (ज्ञापांक सं०-GS (DSW-627/26)-557/26) के बाद मची अफरा-तफरी को शांत करने के लिए, इंटर्नशिप सेल ने 7 मई को यह “स्पष्टीकरण” जारी किया । सबसे बड़ा निर्देश यह है कि छात्रों से इंटर्नशिप के नाम पर टैक्स सहित अधिकतम ₹500 ही लिए जा सकते हैं ।
यद्यपि इससे मनमानी फीस (जैसे कि NGO द्वारा 700 रुपये) पर रोक लगेगी, लेकिन जानकार इसे भ्रष्टाचार को “कानूनी रूप” देने का प्रयास मान रहे हैं । यदि 10,000 छात्र भी ₹500 देते हैं, तो उन कंपनियों को ₹50 लाख का फिक्स व्यापार मिल जाएगा, जिनके पास विश्वविद्यालय द्वारा मांगे गए 3 साल के अनुभव का रत्ती भर भी प्रमाण नहीं है ।
कॉलेजों पर भारी दबाव विश्वविद्यालय ने गेंद कॉलेजों के पाले में डाल दी है। निर्देश के बिंदु 2 के अनुसार, कॉलेजों को अपने नोटिस बोर्ड और वेबसाइट के माध्यम से इन सूचीबद्ध (empanelled) संस्थाओं को आमंत्रित करना होगा और उन्हें न्यूनतम 5 कार्य दिवस का समय देना होगा । यह समझौता (MoU) ‘नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प’ पर किया जाएगा, जिससे यह एक कानूनी बाध्यता बन जाएगा ।
नोटिस के पहले बिंदु में यह झुनझुना भी पकड़ाया गया है कि कॉलेज अपने स्तर से “शुल्करहित” (Free) इंटर्नशिप के लिए भी MoU कर सकते हैं । लेकिन मधेपुरा जैसे इलाके में, जहां उद्योग ही नहीं हैं, हजारों छात्रों के लिए फ्री इंटर्नशिप खोजना असंभव है, जिससे छात्र मजबूरी में इन्हीं अयोग्य कंपनियों के जाल में फंसेंगे ।
कागजी औपचारिकताएं और लीपापोती छात्रों के गुस्से को कम करने के लिए नोटिस के बिंदु 4 में कहा गया है कि MoU में छात्रों को “स्टाइपेंड (Stipend) और प्लेसमेंट” देने का विकल्प भी रखा जा सकता है । कॉलेजों को निर्देश दिया गया है कि वे MoU की हार्ड और सॉफ्ट कॉपी विश्वविद्यालय के इंटर्नशिप प्रकोष्ठ को भेजें , और इंटर्नशिप की सभी रिपोर्ट सीधे छात्र कल्याण अध्यक्ष (DSW) कार्यालय को भेजी जाए ।
सवाल अब भी वही है: फीस ₹500 हो या ₹700, जो कंपनी RFP जारी होने से महज़ 50 दिन पहले बनी हो, उसके साथ कॉलेज ‘नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प’ पर कानूनी समझौता क्यों करें? ।