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बीएनएमयू इंटर्नशिप घोटाला: अधिकारियों में मची खलबली, कुलसचिव ने झाड़ा पल्ला, DSW की हैरान करने वाली दलील- “योग्य कंपनियां नहीं मिलीं तो क्या प्रक्रिया रोक देते?”

बीएनएमयू (BNMU) में इंटर्नशिप के नाम पर महाघोटाला! जानिए कैसे 3 साल के अनुभव के अनिवार्य नियम को ताक पर रखकर , मात्र 50 दिन पुरानी कंपनी को ठेका सौंप दिया गया । छात्रों से ₹500 वसूलने और ‘ऑनलाइन’ इंटर्नशिप के नाम पर करोड़ों की संस्थागत लूट की पूरी खोजी रिपोर्ट और अधिकारियों के चौंकाने वाले कबूलनामे की इनसाइड स्टोरी पढ़ें।

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मधेपुरा: भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय (BNMU) में सामने आए करोड़ों रुपये के इंटर्नशिप घोटाले के बाद अब शीर्ष अधिकारियों में खलबली मच गई है। खुद को बचाने के लिए अधिकारी अब एक-दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं। कॅम्पस रिपोर्टर  ने जब पत्रकारिता के धर्म का पालन करते हुए दूसरे पक्ष का नज़रिया जानने के लिए विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों से संपर्क किया, तो जवाबदेही से भागने और नियमों को ताक पर रखने की खुली स्वीकारोक्ति सामने आई।

कुलसचिव ने खड़े किए हाथ

हमारे संवाददाता ने सबसे पहले कुलसचिव से संपर्क किया, जिनके हस्ताक्षर से 13 अप्रैल 2026 को मूल निविदा (RFP) जारी की गई थी । लेकिन उन्होंने इस पूरे विवाद से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया।

कुलसचिव ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह इंटर्नशिप प्रदाताओं (ISPs) की चयन समिति का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने सारा ठीकरा छात्र कल्याण अध्यक्ष (DSW) के सिर फोड़ते हुए कहा कि चयन, मूल्यांकन और कंपनियों को सूचीबद्ध करने की पूरी जिम्मेदारी DSW की है। यह बयान अपने आप में हैरान करने वाला है कि जिस अधिकारी के हस्ताक्षर से निविदा निकली, वह उसके मूल्यांकन से खुद को कैसे अलग कर सकता है?

DSW का बेतुका तर्क: खुली स्वीकारोक्ति

कुलसचिव के बयान के बाद, कॅम्पस रिपोर्टर ने DSW से तीखे सवाल किए। शुरुआत में उनका रवैया बेहद टालमटोल वाला और चिड़चिड़ा था। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि RFP में अनिवार्य ‘3 साल के अनुभव’ वाले नियम को दरकिनार कर 50 दिन पुरानी कंपनी को ठेका क्यों दिया गया, तो उनका जवाब इस पूरे घोटाले की सबसे बड़ी स्वीकारोक्ति बन गया।

DSW ने अपनी सफाई में कहा: “हमें योग्य कंपनियां नहीं मिलीं, तो मैं क्या करता? क्या प्रक्रिया को रोक देता?”

यह बयान इस बात का ‘ऑन-रिकॉर्ड’ सबूत है कि DSW ने जानबूझकर विश्वविद्यालय के अपने ही नियमों का उल्लंघन किया। सरकारी खरीद (Public Procurement) का सामान्य नियम है कि यदि योग्य टेंडर नहीं मिलते हैं, तो टेंडर रद्द करके उसे दोबारा निकाला जाता है (Re-tender)। नियमों को तोड़कर हजारों छात्रों का भविष्य अनुभवहीन कंपनियों के हाथों में सौंपना किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं है।

‘प्रेजेंटेशन’ का बहाना और छिपाए गए आंकड़े

जब हमारे संवाददाता ने DSW से यह पूछा कि इस टेंडर के लिए कुल कितनी कंपनियों ने आवेदन किया था, तो वे आंकड़े बताने से मुकर गए

उन्होंने अपनी बात को सही ठहराने के लिए कहा कि चयन कंपनियों के “प्रेजेंटेशन” (PPT) और “कई अन्य कारकों” के आधार पर किया गया, क्योंकि “अधिक योग्य कंपनियां नहीं थीं।”

यह दलील पूरी तरह से खोखली है। हमारे संवाददाता ने तफतीश में पता लगाया के लगभग 22-25 कॉम्पनियों ने इन्टर्न्शिप एजेंसी बनने के लिए आवेदन दिया था । इनमे से लगभग 18 अलग कॉम्पनियों ने 21/04/2026 को प्रेज़न्टैशन (PPT) में हिस्सा भी लिया । 

ग़ौर करने लायक बात ये है की अगर कॉम्पनियाँ मूल निविदा (RFP) के मानकों को पूरा नहीं कर रही थी तो उन्हें  प्रेज़न्टैशन (PPT) में बुलाने की क्या मजबूरी थी।  जिस प्रेज़न्टैशन (PPT) का हवाला भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के DSW दे रहे हैं उस प्रेज़न्टैशन (PPT) में भाग लेने वाली तीन कॉम्पनियों को हमारे संवाददाता ने संपर्क किया । उनके हवाले से हमें जानकारी मिली के प्रेज़न्टैशन (PPT) में प्रेज़न्टैशन वाली कोई बात नहीं थी । वह बस महज एक छलावा था क्यूंकी मानकों को पूरा करने के बावजूद उनका नाम चयनित ISP की सूची में नहीं आया। उनके पास जीएसटी(GST) प्राइवेट लिमिटेड होने का प्रमाण पत्र , 3 साल से जायद का अनुभव आदि सारे कागजात मौजूद थे जो उन्होंने अपने आवेदन के साथ जमा किए थे । उन्होंने बताया के प्रेज़न्टैशन में मौजूद 4 लोग सिर्फ इतना जानना चाहते थे के आप इंटर्नशिप के लिए कितना शुल्क लेंगे। इसके लिए उन्होंने कोई लिखित रूप से आवेदन भी नहीं कराया ।    

एक 50 दिन पुरानी कंपनी एक शानदार PowerPoint प्रेजेंटेशन तो दे सकती है, लेकिन वह RFP के खंड 6(F) के तहत मांगे गए “पुरानी इंटर्नशिप के फीडबैक” कहां से लाएगी? सबसे बड़ी बात, DSW यह रोना रो रहे हैं कि योग्य कंपनियां नहीं आईं, लेकिन वे यह भूल गए कि विश्वविद्यालय ने देशभर की कंपनियों को आवेदन करने के लिए महज़ 5 दिन का समय दिया था और 25 कॉम्पनियाँ आई थी 

विश्वविद्यालय प्रशासन ने 5 दिन का टेंडर निकालकर खुद एक “कृत्रिम कमी” पैदा की, और अब उसी कमी का बहाना बनाकर 50 दिन पुरानी कंपनियों को करोड़ों का टेंडर बांट दिया गया है। DSW का यह बयान कोई बचाव नहीं, बल्कि घोटाले का कबूलनामा है।

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