दिल्ली सरकार ने 5 अगस्त 2025 को विधानसभा में Delhi School Education (Transparency in Fixation and Regulation of Fees) Bill, 2025 पेश किया, जिसका मकसद निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोतरी को नियंत्रित करना और अभिभावकों के अधिकारों को मजबूत करना है। बिल के अंतर्गत प्राइवेट अनऑडेड स्कूल—भले ही वे सरकारी ज़मीन पर न हों या अल्पसंख्यक संस्थान हों—को फीस बढ़ाने से पहले औपचारिक अनुमति लेनी होगी और उनके वित्तीय रिकॉर्ड को सार्वजनिक करना अनिवार्य होगा। स्कूलों को तीन वर्ष में केवल एक बार ही फीस वृद्धि की अनुमति होगी और फीस निर्धारण से पहले स्कूल-स्तरीय फीस रेगुलेशन कमेटी बनाई जाएगी, जिसमें स्कूल मैनेजमेंट, शिक्षक और अभिभावक शामिल होंगे। इस व्यवस्था के पहले चरण के तहत स्कूल में PTA से चयनित पांच अभिभावक भी होंगे, जो फीस बढ़ोतरी की प्रक्रिया में भाग लेंगे।
बिल में तीन-tier निगरानी तंत्र की व्यवस्था की गई है — स्कूल-स्तरीय, जिला-स्तरीय और राज्य-स्तरीय — ताकि विवादों और शिकायतों का समयबद्ध समाधान हो सके। यदि कोई स्कूल अनधिकृत फीस बढ़ोतरी करता है, तो पहले उल्लंघन पर ₹1 लाख से ₹5 लाख तक जुर्माना लगेगा और दोहराए जाने पर यह ₹10 लाख तक बढ़ सकता है। बिल के तहत यदि स्कूल समय पर रिफंड नहीं करता है, तो जुर्माना और बढ़ जाता है, और लगातार गैर-अनुपालन पर स्कूल की मान्यता रद्द या उसका नियंत्रण सरकार के पास जा सकता है।
हालाँकि सरकार इस विधेयक को अभिभावकों को दीर्घकालिक राहत देने वाला कदम बताती है, लेकिन AAP समेत कई पैरेंट्स ग्रुप ने बिल की आलोचना की है। विरोधियों का कहना है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए कम से कम 15% अभिभावकों की सहमति जरूरी होगी, जिससे व्यक्तिगत शिकायतें दब सकती हैं। साथ ही यह भी आरोप है कि समिति की अध्यक्षता स्कूल मैनेजमेंट करेगा, जिससे जवाबदेही कमजोर हो सकती है। AAP ने बिल को ‘स्कूलों को फायदा पहुंचाने वाला’ बताते हुए इसे चयन समिति में भेजने की मांग की है और फीस को 2024‑25 स्तर पर凍 कर देने का प्रस्ताव भी रखा है।
इस विवादास्पद बिल ने दिल्ली के शिक्षा-पर्यावरण में नया बहस का माहौल पैदा कर दिया है। जहां सरकार इसे फीस में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने वाला कदम मानती है, वहीं विरोधियों का मानना है कि यह बिल समस्या का समाधान करने के बजाय उसे और गहरा कर सकता है।