Connect with us

Campus Activities

“पटना यूनिवर्सिटी में प्राचार्यों की नियुक्ति लॉटरी से! योग्यता नहीं, किस्मत बनी चयन का आधार

Madhuyanka Raj

Published

on

image of patna university

पटना विश्वविद्यालय में हाल ही में पाँच कॉलेजों में प्राचार्य नियुक्ति का लॉटरी आधारित नया मॉडल आया है, जिसने शिक्षा जगत में हलचल मचा दी है। आइए, इस विवादास्पद फैसले और उसके बाद उठे सवालों को 6–7 पैराग्राफ में समझते हैं:

पारंपरिक चयन प्रक्रिया से हटकर:
पटना विश्वविद्यालय के पंद्रह साल से शून्य पड़े प्राचार्य पदों को बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) की सिफारिश के आधार पर भरा गया. लेकिन नियुक्ति के चयन में लॉटरी का रास्ता अपनाया गया—पहले आयोग ने उम्मीदवार तय किए, फिर कॉलेज-आवंटन लॉटरी के माध्यम से हुआ । इस कदम का मुख्य उद्देश्य था पदों पर पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना।

कैसे हुआ लॉटरी ड्रॉ:
राज्यपाल-सह कुलाधिपति आरिफ मोहम्मद खान के निर्देशन में यह लॉटरी राजभवन की निगरानी में तीन-सदस्यीय पैनल (जिसमें कुलपति और रजिस्ट्रार शामिल) द्वारा वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ आयोजित की गई । यह निर्णय पूर्व की नियुक्तियों में गड़बड़ी की शिकायतों को देखते हुए लिया गया।

अजीब नियुक्तियाँ, गैर-विशेषज्ञ:
लॉटरी का नतीजा है कि कई कॉलेजों में ऐसे प्राचार्य तैनात हुए, जिनका विषय उस कॉलेज से मेल नहीं खाता—उदाहरण स्वरूप, रसायन विज्ञान के प्रो. अनिल कुमार को कला कॉलेज का, गृह विज्ञान की प्रो. अल्का यादव को विज्ञान कॉलेज का, और मानविकी की सुहेली मेहता को वाणिज्य महाविद्यालय का प्राचार्य नियुक्त किया गया । मगध महिला कॉलेज में पुरुष प्राचार्य न. पा. वर्मा की नियुक्ति भी चर्चा में है।

राज्यपाल का बचाव:
राज्यपाल ने कहा कि यह प्रक्रिया व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से बचने के लिए अपनाई गई है। यह सुनिश्चित करता है कि नियुक्ति बेदखल और निष्पक्ष तरीके से हो रही है.

शिक्षाविदों और विपक्ष की प्रतिक्रिया:
कई शिक्षाविदों ने प्रश्न उठाया—क्या गृह विज्ञान की विशेषज्ञ वाणिज्य कॉलेज चला सकती हैं? क्या रसायन विज्ञान के प्रोफ़ेसर को कला कॉलेज की गहराई समझ में आएगी? उनका कहना था कि यह निर्णय “योग्यता और अनुभव पर आधारित होना चाहिए, भाग्य पर नहीं”  माकपा विधायक ने भी केंद्र को संज्ञान लेने की मांग की।

मायावती का तीखा हमला:
बसपा प्रमुख मायावती ने इस प्रक्रिया को “विकृत प्रयोग” बताते हुए केंद्र से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है। उनका तर्क है कि विशेषज्ञता कमजोर होती है और भविष्य में इस प्रणाली का प्रसार मेडिकल, आईआईटी‑स्तरीय संस्थानों तक हो सकता है। उन्होंने इसे उच्च शिक्षा की गरिमा को मिटाने वाला बताया।

क्या यह भविष्य का मॉडल होगा?
बीएसयूएससी ने यह पहली बार पाँच कॉलेजों में अपनाया है, ताकि राजनीति और लॉबिंग से मुक्त हो जाएं नियुक्ति प्रक्रिया। हालांकि इसकी गूंज शिक्षाविदों और राजनैतिक स्तर पर अब भी बनी हुई है। अंतिम निर्णय यह होगा कि क्या इस मॉडल को आगे बढ़ाया जाएगा या इसे समय रहते वापस ले लिया जाएगा—और ज़ाहिर है, केंद्र सरकार की देखार भी अब जरूरी हो गई है।

यह मुद्दा केवल पटना तक ही सीमित नहीं रह गया है—यह देश भर के शैक्षिक संस्थानों के चयन ढांचे पर सवाल खड़ा करता है। जहाँ एक तरफ पारदर्शिता की बातें हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ विशेषज्ञता और संस्थागत उपयुक्तता की गंभीर चिंता है।

Madhuyanka Raj is a poet, writer, and journalist whose work bridges the worlds of literature and contemporary reportage. With a voice rooted in both lyrical introspection and investigative clarity, Madhuyanka has published poetry in acclaimed literary journals and contributed features, essays, and reportage to a range of national and international publications. Their writing explores themes of identity, social justice, and the human condition, often blending narrative depth with poetic nuance. Madhuyanka is passionate about telling stories that challenge, illuminate, and inspire. When not chasing a deadline or crafting verse, they often speak at literary festivals and lead workshops on creative writing and journalistic integrity.