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CBSE ने 10वीं “दूसरी बोर्ड परीक्षा” पर लगाया पाबंदी — सिर्फ 40% छात्र ही होंगे शामिल, कुछ बच्चे डब्ल्यूंचित रह सकते हैं
Published
6 months agoon

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने कक्षा 10 के छात्रों के लिए 2026 से लागू होने वाली “दो-एग्ज़ाम” प्रणाली के संदर्भ में बड़ी सीमा तय की है: बोर्ड अध्यक्ष राहुल सिंह के मुताबिक, दूसरी (इम्प्रूवमेंट) परीक्षा में लगभग सिर्फ 40 प्रतिशत छात्र ही शामिल होंगे।
कौन नहीं ले सकेगा दूसरी परीक्षा?
CBSE ने स्पष्ट किया है कि कुछ छात्र इस सिस्टम का लाभ नहीं उठा पाएंगे:
वे छात्र जो पहली परीक्षा में तीन या उससे अधिक विषयों का परीक्षा नहीं देते हैं, उन्हें दूसरी बार बोर्ड देने की अनुमति नहीं होगी।
साथ ही, छात्र पहले और दूसरी परीक्षा के बीच किसी विषय को बांटकर (split) देने का अधिकार नहीं रखेंगे — यह “opportunity shopping” को रोकने की CBSE की मंशा है।
दूसरी परीक्षा में छात्र वहीं तीन विषयों तक सुधार (इम्प्रूवमेंट) कर सकते हैं, और सिर्फ उन विषयों में जिनमें बाह्य (external) मूल्यांकन 50% से अधिक है।
CBSE की मंशा — “समीकरण, लेकिन सीमाएं”
राहुल सिंह ने यह व्यवस्था NEP 2020 के सिद्धांतों के अनुरूप बताई है, ताकि बोर्ड परीक्षा का “उच्च दांव वाला” (high-stakes) चरित्र शांत हो सके।
लेकिन बोर्ड यह भी कहना चाह रहा है कि यह सुविधा केवल “सुधार की मौके” के लिए है, न कि परीक्षा को दोबारा देने का एक रास्ता:
“हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि छात्र पहली परीक्षा को गंभीरता से लें, क्योंकि यही उनकी मुख्य परीक्षा होगी।”
मूल्यांकन का बोझ कम होगा?
दूसरी परीक्षा में कॉपियों की संख्या पहली तुलना में बहुत कम रहने की उम्मीद है। CBSE अध्यक्ष के मुताबिक, पहली परीक्षा में लगभग 1.5 करोड़ पेपर मूल्यांकन के लिए आएंगे, जबकि दूसरी परीक्षा में अनुमानतः सिर्फ 20-30 लाख उत्तरपुस्तिकाओं की जांच की जाएगी। यह न केवल शिक्षकों पर दबाव कम करेगा, बल्कि बोर्ड को परिणाम समय पर घोषित करने में भी मदद करेगा। वही लक्ष्य CBSE ने रखा है: दूसरी परीक्षा का पूरा चक्र 30 जून तक बंद करना।
आलोचना और चिंताएं
यह नीति छात्रों और माता-पिता के बीच मिश्रित प्रतिक्रिया ला रही है:
कुछ लोग इसे छात्रों को “दूसरी मौका” देने के रूप में देख रहे हैं — खासकर उन छात्रों के लिए जो पहली परीक्षा में कम अंक लाए या असफल हुए।
वहीं आलोचक कहते हैं कि 40% की सीमा “पहुंच में भेद” पैदा कर सकती है और बहुत सारे इच्छुक और योग्य छात्रों को बाहर करना पड़ सकता है।
साथ ही, “तीन विषय” तक सीमित सुधार के विकल्प को भी कुछ लोग अपर्याप्त मान रहे हैं, क्योंकि इससे उन्हें अपने अन्य कमजोर विषयों में सुधार करने का मौका नहीं मिलेगा।
CBSE की यह नई दो-एग्ज़ाम पॉलिसी निश्चित रूप से एक नवीन प्रयास है — लेकिन इसे “हर छात्र को दोबारा मौका” देने वाली पूरी आज़ादी से बहुत सीमित रखा गया है। 40% की अनुमानित हिस्सेदारी, विषयों की चयनात्मकता, और अनुपस्थिति संबंधी सख्त नियम यह दिखाते हैं कि बोर्ड संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है — लेकिन क्या यह “नंबर सुधार” की प्रक्रिया को मानवीय और न्यायसंगत बनाएगा, यह समय ही बताएगा।
Madhuyanka Raj is a poet, writer, and journalist whose work bridges the worlds of literature and contemporary reportage. With a voice rooted in both lyrical introspection and investigative clarity, Madhuyanka has published poetry in acclaimed literary journals and contributed features, essays, and reportage to a range of national and international publications. Their writing explores themes of identity, social justice, and the human condition, often blending narrative depth with poetic nuance. Madhuyanka is passionate about telling stories that challenge, illuminate, and inspire. When not chasing a deadline or crafting verse, they often speak at literary festivals and lead workshops on creative writing and journalistic integrity.
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